Gaurinatham Vishwanatham | कल्किकृत शिवस्तोत्रम् | गौरीनाथं विश्वनाथं शरण्यं: दोस्तो नमस्कार, आज हम आप लोगों को इसी पोस्ट के माध्यम से कल्किकृत शिवस्तोत्रम् के बारे में बताएंगे। महाकाल की अनुग्रह प्राप्ति के लिए कल्किकृत शिवस्तोत्रम् अत्यधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसमें भगवान शिव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन किया गया है।
Gaurinatham Vishwanatham
कल्किकृत शिवस्तोत्रम्
गौरीनाथं विश्वनाथं शरण्यं
गौरीनाथं विश्वनाथं शरण्यं
भूतावासं वासुकीकण्ठभूषम् ।
त्र्यक्षं पंचास्यादिदेवं पुराणं
वंदे सांद्रानंदसंदोहदक्षम् ॥१॥
भावार्थ: मैं गौरीपति, विश्वनाथ, सबका शरणदाता, समस्त भूतों के वासस्थान, वासुकी सर्प को कंठ में धारण करने वाले,
तीन नेत्रोंवाले, पाँच मुखोंवाले, आदि देव, सनातन परमात्मा, और घनी आनंद-राशि में दक्ष महेश्वर का वंदन करता हूँ।
योगाधीशं कामनाशं करालं
गंगासंगक्लिन्नमूर्धानमीशम् ।
जटाजूटाटोपरिक्षिप्तभावं
महाकालं चंद्रभालं नमामि ॥२॥
भावार्थ: जो योगियों के अधिपति हैं, कामदेव का नाश करने वाले हैं, कराल रूपधारी हैं, गंगा से भीगे हुए सिरवाले हैं, जिनकी जटाएं सिर को ढँके हुए हैं, जो महाकाल हैं, और जिनके मस्तक पर चंद्र विराजमान है — ऐसे ईश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्मशानस्थं भूतवेतालसंगं
नानाशस्त्रैः खङ्गशूलादिभिश्च ।
व्यग्रात्युग्रा बाहवो लोकनाशे
यस्य क्रोधोद्भूतलोकोऽस्तमेति ॥३॥
भावार्थ: जो श्मशान में निवास करते हैं, भूतों और वेतालों के साथ रहते हैं, अनेक प्रकार के शस्त्र — खड्ग, शूल आदि से सुसज्जित हैं,
जिनकी भुजाएँ व्याकुल और अत्यंत उग्र हैं, जिनके क्रोध से संपूर्ण सृष्टि अस्तित्व से मिट जाती है, उन शिव को मैं नमन करता हूँ।
यो भूतादिः पंचभूतैः सिसृक्षु
स्तन्मात्रात्मा कालकर्मस्वभावैः ।
प्रहृत्येदं प्राप्य जीवत्वमीशो
ब्रह्मानंदे क्रीडते तं नमामि ॥४॥
भावार्थ: जो सृष्टिकर्ता हैं, पंचमहाभूतों से इस जगत की रचना करने वाले हैं, जो तन्मात्रा (सूक्ष्म तत्त्व), काल, कर्म और स्वभाव से सृष्टि रचते हैं, जो इस जगत को बनाकर उसमें जीव रूप से प्रवेश करते हैं, और फिर ब्रह्मानंद में लीला करते हैं — ऐसे ईश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
स्थितौ विष्णुः सर्वजिष्णुः सुरात्मा
लोकान्साधून्धर्मसेतून्बिभर्ति ।
ब्रह्माद्यंशे योऽभिमानी गुणात्मा
शब्दाद्यंगैस्तं परेशं नमामि ॥५॥
भावार्थ: स्थिति (पालन) के कार्य में जो विष्णुरूप से विराजते हैं, सर्वविजयी हैं, देवताओं के आत्मस्वरूप हैं, लोकों और धर्म के रक्षाकर्ता हैं, जो ब्रह्मा आदि के अंशों में अभिमानी हैं, गुणों के धारक हैं और शब्द आदि इन्द्रिय-तत्त्वों में प्रकट होते हैं —
ऐसे परब्रह्म परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।
यस्याज्ञया वायवो वान्ति लोके
ज्वलत्यग्निः सविता याति तष्यन् ।
शीतांशुः खे तारकासंग्रहश्च
प्रवर्तते तं परेशं प्रपद्ये ॥६॥
भावार्थ: जिनकी आज्ञा से वायु संसार में प्रवाहित होती है, अग्नि प्रज्वलित होती है, सूर्य गमन करता है, चंद्रमा अपनी शीतलता फैलाता है, और तारागण एवं नक्षत्र समूह अपनी गति में चलते हैं — ऐसे सर्वोच्च परमेश्वर की मैं शरण लेता हूँ।
यस्य श्वासात्सर्वधात्री धरित्री
देवो वर्षत्यंबुकालः प्रमाता ।
मेरुर्मध्ये भुवनानां च भर्ता
तमीशानं विश्वरूपं नमामि ॥७॥
भावार्थ: जिनके श्वास से यह संपूर्ण धरती स्थिर रहती है, जिनके द्वारा देवता वर्षा करते हैं, समय मापन होता है, और मेरु पर्वत संपूर्ण लोकों के केंद्र में स्थित है — ऐसे विश्वरूप, ईशान (शिव) को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ इति श्रीकल्किपुराणे कल्किकृत शिवस्तोत्रम् संपूर्णम् ॥
Credit the Video : Religious India YouTube Channel
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