Gayatri Jayanti | गायत्री जयंती और पूजन विधि: हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि, गायत्री जयंती ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष के 11वे दिन मनाया जाता है। पौराणिक कथा है कि, गुरु विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र को इस दिन सबसे पहले आमजनों के कल्याण के लिए कहा था। जिसके बाद से मां गायत्री के उपासक इसका अनुसरण करते है।
गुरु विश्वामित्र के मंत्रों का उच्चारण साधारण किए जाने के बाद से इस पवित्र एकादशी को गायत्री जयंती के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा। एक और प्रचलित लोक मान्यता के अनुसार किवदंती है कि इसे श्रावण पूर्णिमा के समय भी मनाया जाना बहुत ही फलदायी होता है। चलिए पोस्ट के जरिए जानते हैं गायत्री जयंती पूजन विधि, मंत्र और चालिसा।
श्रावण पूर्णिमा तिथि की जानकारी
श्रावन पूर्णिमा तिथि को अत्यंत ही शुभ और पवित्र तिथि माना गया है। नीचे एक तालिका के जरिए हमने श्रावण पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ और समाप्त होने के समय की जानकारी दी हुई है।
गायत्री जयंती पूजन विधि
1. इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाए।
2. जिसके बाद मां गायत्री के निम्मित व्रत एवं पूजा का संकल्प लेते हुए माता गायत्री की प्रतिमा की स्थापना करें।
3. इसके बाद माँ गायत्री के चरणों में गंगा जल अर्पित करें।
4. जल अपर्ण के बाद माता गायत्री को पुष्प और पुष्प की माला अर्पित करें।
5. जिसके बाद हल्दी अथवा चन्दन का तिलक लगाएं।
6. घी का दीपक व् धुप भी अवश्य लगाएं।
7. अंत में गायत्री चालीसा का श्रद्धा पूर्वक पाठ करें।
8. यदि संभव हो सके तो गायत्री मंत्र का पाठ १०८ बार अवश्य करें।
9. माँ गायत्री की आरती करें उनका भोग लगाएं और अपनी पूजा में जाने अनजाने हुई भूल की क्षमा मांगे।
माता गायत्री कैसे प्रकट हुईं?
हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि, सृष्टि की शुरुआत में ब्रह्मा जी के मुख से सर्वप्रथम गायत्री मंत्र की ही ध्वनि प्रकट हुई थी। सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने सभी प्रकार चारों मुखों से चार वेदों के रूप में की थी। पौराणिक मन्यता यह भी है कि,मानव जीवन के शुरुआत के समय देवी माँ गायत्री की महिमा सिर्फ देवताओं तक ही सीमित थी, किन्तु महर्षि विश्वामित्र जी ने बहुत ही कठोर तपस्या कर माँ की महिमा कर मनुष्यो को भी इससे अवगत कराया।
गायत्री मंत्र:
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थात: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप,
परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें।
वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
श्री गायत्री चालीसा
॥ दोहा ॥
हीं श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शांति, क्रांति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥
जगत जननि, मंगल करनि, गायत्रीसुखधाम ।
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥
॥ चालीसा ॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युतजननी ।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥
अक्षर चौबिस परम पुनीता ।
इनमें बसें शास्त्र, श्रुति,गीता ॥
शाश्वत सतोगुणी सतरुपा ।
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥
हंसारुढ़ सितम्बर धारी ।
स्वर्णकांति शुचि गगन बिहारी॥४॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।
शुभ्र वर्ण तनु नयनविशाला ॥
ध्यान धरत पुलकित हियहोई ।
सुख उपजत, दुःख दुरमति खोई॥
कामधेनु तुम सुर तरुछाया ।
निराकार की अदभुत माया॥
तुम्हरी शरण गहै जोकोई ।
तरै सकल संकट सोंसोई ॥८॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥
तुम्हरी महिमा पारन पावें ।
जो शारद शत मुखगुण गावें ॥
चार वेद की मातुपुनीता ।
तुम ब्रहमाणी गौरी सीता ॥
महामंत्र जितने जग माहीं ।
कोऊ गायत्री सम नाहीं ॥१२॥
सुमिरत हिय में ज्ञानप्रकासै ।
आलस पाप अविघा नासै॥
सृष्टि बीज जग जननिभवानी ।
काल रात्रि वरदा कल्यानी ॥
ब्रहमा विष्णु रुद्र सुर जेते ।
तुम सों पावें सुरतातेते ॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥१६॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
जै जै जै त्रिपदाभय हारी ॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक नजग में आना ॥
तुमहिं जानि कछु रहैन शेषा ।
तुमहिं पाय कछु रहैन क्लेषा ॥
जानत तुमहिं, तुमहिं है जाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौरसमाई ॥
ग्रह नक्षत्र ब्रहमाण्ड घनेरे ।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥
सकलसृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पतकीभारी ॥२४॥
जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सबकोई ॥
मंद बुद्घि ते बुधि बलपावें ।
रोगी रोग रहित हैजावें ॥
दारिद मिटै कटै सबपीरा ।
नाशै दुःख हरै भवभीरा ॥
गृह कलेश चित चिंताभारी ।
नासै गायत्री भय हारी ॥२८॥
संतिति हीन सुसंतति पावें।
सुख संपत्ति युत मोद मनावें॥
भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकटनहिं आवें ॥
जो सधवा सुमिरें चितलाई ।
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥
घर वर सुख प्रदलहैं कुमारी ।
विधवा रहें सत्य व्रतधारी ॥३२॥
जयति जयति जगदम्ब भवानी।
तुम सम और दयालुन दानी ॥
जो सदगुरु सों दीक्षा पावें।
सो साधन को सफलबनावें ॥
सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी।
लहैं मनोरथ गृही विरागी ॥
अष्ट सिद्घि नवनिधि की दाता ।
सब समर्थ गायत्री माता ॥३६॥
ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, जोगी।
आरत, अर्थी, चिंतित, भोगी ॥
जो जो शरण तुम्हारीआवें ।
सो सो मन वांछितफल पावें ॥
बल, बुद्घि, विघा, शील स्वभाऊ ।
धन वैभव यश तेजउछाऊ ॥
सकल बढ़ें उपजे सुख नाना।
जो यह पाठ करैधरि ध्याना ॥४०॥
॥ दोहा ॥
यह चालीसा भक्तियुत, पाठ करे जोकोय ।
तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्रीकी होय ॥
श्री गायत्री माँ आरती
जयतिजय गायत्री माता, जयति जय गायत्रीमाता।
आदि शक्ति तुम अलख निरंजनजगपालक कर्त्री।
दु:ख शोक, भय,क्लेश कलश दारिद्र दैन्यहत्री॥ जयति ..
ब्रह्म रूपिणी, प्रणात पालिन जगत् धातृ अम्बे।
भव भयहारी, जन-हितकारी, सुखदाजगदम्बे॥ जयति ..
भय हारिणी, भवतारिणी, अनघेअज आनन्द राशि।
अविकारी, अखहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥ जयति ..
कामधेनु सतचित आनन्द जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती, शक्तितुम सावित्री सीता॥ जयति ..
ऋग, यजु साम, अथर्वप्रणयनी, प्रणव महामहिमे।
कुण्डलिनी सहस्त्र सुषुमन शोभा गुण गरिमे॥जयति ..
स्वाहा, स्वधा, शची ब्रह्माणी राधारुद्राणी।
जय सतरूपा, वाणी, विद्या, कमला कल्याणी॥ जयति..
जननी हम हैं दीन-हीन, दु:ख-दरिद्र के घेरे।
यदपि कुटिल, कपटी कपूत तउबालक हैं तेरे॥ जयति..
स्नेहसनी करुणामय माता चरण शरणदीजै।
विलख रहे हम शिशुसुत तेरे दया दृष्टिकीजै॥ जयति ..
काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ,दुर्भाव द्वेष हरिये।
शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय मन कोपवित्र करिये॥ जयति ..
तुम समर्थ सब भांति तारिणीतुष्टि-पुष्टि द्दाता।
सत मार्ग पर हमें चलाओ,जो है सुखदाता॥
॥ जयति जय गायत्री माता,जयति जय गायत्री माता ॥
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