Shri Ganesh Sankat Nashan Stotra | प्रणम्य शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम | संकटनाशन श्री गणेश द्वादश नाम स्तोत्रम: दोस्तों नमस्कार, आज हम इस लेख माध्यम से श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र (Shri Sankat Nashan Ganesh Stotra) इन विषयों को सरल शब्दों में आपको समझाने का प्रयास करेंगे। तो चलिए जानते हैं इसे करने की पूजा आराधना और फायदे:
हिंदू धर्म में किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले भगवान शिव के पुत्र, गणों के स्वामी, श्री गणेश जी को, सभी देवताओं में प्रथम पूजा की जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणेश जी का नाम किसी भी शुभ कार्य से पहले लिया जाता है। इसीलिए गणेश जी की पूजा करते समय गणेश जी की आरती, गणेश चालीसा, श्री गणेशपञ्चरत्नम्, ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र, श्री गणेश रक्षा स्त्रोतम, द्वादश नामों (सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन) और मंत्रों का जाप किया जाता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री गणेश का नाम स्मरण करने मात्र से जीवन में आए सभी प्रकार के कष्टों का नाश हो जाता है। इसीलिए गणेश जी की पूजा आराधना के लिए “श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र” का पाठ बहुत ही सिद्ध स्तोत्र माना गया है। इस स्तोत्र को श्री संकटनाशन स्तोत्र अथवा सङ्कटनाशन गणपति स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है। इस चमत्कारी स्तोत्र के पाठ से ही किसी भी काम की सफलता तय है।
Sankat Nashan Dwadash Naam Stotra
Shri Ganesh Sankat Nashan Stotaram
श्री गणेश का लोकप्रिय संकटनाशन स्तोत्र
संकटनाशन श्री गणेश द्वादश नाम स्तोत्रम
प्रणम्य शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम
श्रीगणेशाय नमः । नारद उवाच ।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुः कामार्थसिद्धये ॥ १॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभुः ॥ ५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥
॥ इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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