Sri Jagannatha Ashtakam | श्री जगन्नाथाष्टकम् | ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥାଷ୍ଟକମ୍: दोस्तों नमस्कार, आज हम आप लोगों को इस पोस्ट के माध्यम से श्री जगन्नाथाष्टकम् (Sri Jagannatha Ashtakam) के बारे में बात करेंगे। संस्कृत में जगन्नाथ का अर्थ है जग यानी दुनिया और नाथ का अर्थ है भगवान। भगवान जगन्नाथ यानी कृष्ण भगवान विष्णु का अवतार जो जगत के स्वामी है। आदि शंकराचार्य ने भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में अपनी यात्रा के दौरान जब प्रथम बार जगन्नाथ जी के दर्शन केए, तब भगवान् जगन्नाथ को देखकर जगन्नाथ जी की स्तुति की, ओर आठ श्लोक की श्री जगन्नाथ अष्टकम रचना किया। पुरुषोत्तम क्षेत्र पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा तीनों जब तीन अलग अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर रथ यात्रा को निकलते हैं, उसी जगन्नाथ रथ यात्रा के विवरण को आदि शंकराचार्य ने श्री जगन्नाथाष्टकम् में सुंदरता से चित्रित किया है। यह अष्टकम इतना शक्तिशाली है, जिसके पाठ से मनुष्य की आत्मा पापो से मुक्त होकर, पवित्र होकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करती है। इन श्लोकों को पूरी श्रद्धा और पूर्ण भक्ति के साथ पाठ करने से भगवान जगन्नाथ जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तो आइये सबसे पहले सुमिरन करते हैं श्रीजगन्नाथाष्टकम्:
श्री जगन्नाथाष्टकम्
श्री जगन्नाथ अष्टकम
कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥
महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥
॥ इति श्रीमत् शंकराचार्यविरचितं जगन्नाथाष्टकं संपूर्णम् ॥
Sri Jagannatha Ashtakam
Kadacit Kalindi Tata Vipina Sangita Taralo
Mudabhiri Nari Vadana Kamala Svada Madhupah ।
Rama Sambhu Brahmamarapati GaneSarcita Pado
Jagannathah Svami Nayana Patha Gami Bhavatu Me ॥ 1 ॥
Bhuje Savye Venum Sirasi Sikhipiccham Katitate
Dukulam Netrante Sahacara-Kataksam Vidadhate ।
Sada Srimad-Vṛndavana-Vasati-Lila-Paricayo
Jagannathah Svami Nayana-Patha-Gami Bhavatu Me ॥ 2 ॥
Mahambhodhestire Kanaka Rucire Nila Sikhare
Vasan Prasadantah Sahaja Balabhadrena Balina ।
Subhadra Madhyasthah Sakalasura Sevavasarado
Jagannathah Svami Nayana-Patha-Gami Bhavatu Me ॥ 3 ॥
Kṛpa Paravarah Sajala Jalada Sreniruciro
Rama Vani Ramah Sphurad Amala Pankeruhamukhah ।
Surendrair Aradhyah Srutigana Sikha Gita Carito
Jagannathah Svami Nayana Patha Gami Bhavatu Me ॥ 4 ॥
Ratharuḍho Gacchan Pathi Milita Bhudeva Patalaih
Stuti Pradurbhavam Pratipadamupakarnya Sadayah ।
Daya Sindhurbandhuh Sakala Jagatam Sindhu Sutaya
Jagannathah Svami Nayana Patha Gami Bhavatu Me ॥ 5 ॥
ParambrahmapirAh Kuvalaya-Dalotphulla-Nayano
Nivasi Niladrau Nihita-Carano’nanta-Sirasi ।
Rasanandi Radha-Sarasa-Vapuralingana-Sukho
Jagannathah Svami Nayana-Pathagami Bhavatu Me ॥ 6 ॥
Na Vai Yace Rajyam Na Ca Kanaka Manikya Vibhavam
Na Yace’ham Ramyam Sakala Jana Kamyam Varavadhum ।
Sada Kale Kale Pramatha Patina Gitacarito
Jagannathah Svami Nayana Patha Gami Bhavatu Me ॥ 7 ॥
Hara Tvam Samsaram Drutataram Asaram Surapate
Hara Tvam Papanam Vitatim Aparam Yadavapate ।
Aho Dine’nathe Nihita Carano NiScitamidam
Jagannathah Svami Nayana Patha Gami Bhavatu Me ॥ 8 ॥
Jagannathastakam Punyam Yah Pathet Prayatah Sucih
Sarvapapa ViSuddhatma Visnulokam Sa Gacchati ॥ 9 ॥
॥ Iti Srimad Sankaracaryapranitam Jagannathastakam Sampurnam ॥
ଜଗନ୍ନାଥାଷ୍ଟକମ୍
କଦାଚିତ୍-କାଲିଂଦୀ ତଟବିପିନ ସଂଗୀତକରବୋ
ମୁଦାଭୀରୀ ନାରୀବଦନ କମଲାସ୍ଵାଦମଧୁପଃ ।
ରମା ଶଂଭୁ ବ୍ରହ୍ମାମରପତି ଗଣେଶାର୍ଚିତ ପଦୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୧ ॥
ଭୁଜେ ସବ୍ୟେ ବେଣୁଂ ଶିରସି ଶିଖିପିଂଛଂ କଟିତଟେ
ଦୁକୂଲଂ ନେତ୍ରାଂତେ ସହଚରକଟାକ୍ଷଂ ବିଦଧତେ ।
ସଦା ଶ୍ରୀମଦ୍ବୃଂଦାବନବସତିଲୀଲାପରିଚୟୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ନେ ॥ ୨ ॥
ମହାଂଭୋଧେସ୍ତୀରେ କନକରୁଚିରେ ନୀଲଶିଖରେ
ବସନ୍ ପ୍ରାସାଦାଂତସ୍ସହଜ ବଲଭଦ୍ରେଣ ବଲିନା ।
ସୁଭଦ୍ରା ମଧ୍ୟସ୍ଥସ୍ସକଲସୁର ସେବାବସରଦୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୩ ॥
କୃପା ପାରାବାରାସ୍ସଜଲ ଜଲଦ ଶ୍ରେଣିରୁଚିରୋ
ରମାବାଣୀ ରାମସ୍ଫୁରଦମଲ ପଂକେରୁହମୁଖଃ ।
ସୁରେଂଦ୍ରୈରାରାଧ୍ୟଃ ଶ୍ରୁତିଗଣଶିଖା ଗୀତ ଚରିତୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୪ ॥
ରଥାରୂଢୋ ଗଚ୍ଛନ୍ ପଥି ମିଲିତ ଭୂଦେବପଟଲୈଃ
ସ୍ତୁତି ପ୍ରାଦୁର୍ଭାବଂ ପ୍ରତିପଦମୁପାକର୍ଣ୍ୟ ସଦୟଃ ।
ଦୟାସିଂଧୁର୍ବଂଧୁସ୍ସକଲ ଜଗତା ସିଂଧୁସୁତୟା
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୫ ॥
ପରବ୍ରହ୍ମାପୀଡଃ କୁବଲୟ-ଦଲୋତ୍ଫୁଲ୍ଲନୟନୋ
ନିବାସୀ ନୀଲାଦ୍ରୌ ନିହିତ-ଚରଣୋଽନଂତ-ଶିରସି ।
ରସାନଂଦୋ ରାଧା-ସରସ-ବପୁରାଲିଂଗନ-ସଖୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୬ ॥
ନ ବୈ ୟାଚେ ରାଜ୍ୟଂ ନ ଚ କନକ ମାଣିକ୍ୟ ବିଭବଂ
ନ ୟାଚେଽହଂ ରମ୍ୟାଂ ନିଖିଲଜନ-କାମ୍ୟାଂ ବରବଧୂମ୍ ।
ସଦା କାଲେ କାଲେ ପ୍ରମଥ-ପତିନା ଗୀତଚରିତୋ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୭ ॥
ହର ତ୍ଵଂ ସଂସାରଂ ଦ୍ରୁତତରମସାରଂ ସୁରପତେ
ହର ତ୍ଵଂ ପାପାନାଂ ବିତତିମପରାଂ ୟାଦବପତେ ।
ଅହୋ ଦୀନୋଽନାଥେ ନିହିତଚରଣୋ ନିଶ୍ଚିତମିଦଂ
ଜଗନ୍ନାଥଃ ସ୍ଵାମୀ ନୟନପଥଗାମୀ ଭବତୁ ମେ ॥ ୮ ॥
ଜଗନ୍ନାଥାଷ୍ଟକଂ ପୁନ୍ୟଂ ୟଃ ପଠେତ୍ ପ୍ରୟତଃ ଶୁଚିଃ ।
ସର୍ବପାପ ବିଶୁଦ୍ଧାତ୍ମା ବିଷ୍ଣୁଲୋକଂ ସ ଗଚ୍ଛତି ॥ ୯॥
॥ ଇତି ଶ୍ରୀମଦ୍ ଶଂକରାଚାର୍ୟବିରଚିତଂ ଜଗନ୍ନାଥାଷ୍ଟକଂ ସଂପୂର୍ଣଂ॥
Credit the Video : Shree Jagannatha YouTube Channel
Credit the Video : Rajshri Soul by Susmirata Dawalkar YouTube Channel
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