Vishnumay Jag Vaishnavancha Dharma | विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म: दोस्तो नमस्कार, आज हम आप लोगों को इसी पोस्ट के माध्यम से विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म के बारे में बताएंगे। यह संपूर्ण जगत भगवान विष्णु से व्याप्त है और सभी मनुष्यों में एक ही ईश्वर का वास है। ऊँच-नीच, जाति-पाति या किसी भी प्रकार का भेदभाव केवल भ्रम है और वह अमंगलकारी है।
Vishnumay Jag Vaishnavancha Dharma
विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म
सावळे सुंदर रूप मनोहर ।
राहो निरंतर हृदयी माझे ॥ १ ॥
आणिक काही इच्छा आम्हां नाही चाड ।
तुझे नाम गोड पांडुरंगा ॥ २ ॥
विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म ।
भेदाभेदभ्रम अमंगळ ॥३॥
अइका जी तुम्ही भक्त भागवत ।
कराल तें हित सत्य करा ॥ ४॥
कोणा ही जिवाचा न घडावा मत्सर ।
वर्म सर्वेश्वरपूजनाचें ॥५॥
तुका म्हणे एका देहाचे अवयव ।
सुख दुःख जीव भोग पावे ॥६॥
अभंग – संत तुकाराम महाराज
अर्थ: यह संपूर्ण जगत विष्णुमय है। वैष्णव धर्म ही ऐसा धर्म है जो सबमें एकत्व का संदेश देता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव करना अशुभ और अमंगल है। हे भक्तजनों! भगवान का श्रवण, चिंतन और स्मरण करके अपने जीवन का कल्याण करें। हमारे हाथों किसी भी जीव के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या मत्सर न हो—यही सच्ची ईश्वर-भक्ति है। संत तुकाराम महाराज कहते हैं कि जैसे शरीर के किसी एक अंग में पीड़ा होने पर उसका दर्द पूरे शरीर और उसमें रहने वाले जीव को अनुभव होता है, उसी प्रकार इस विष्णुमय संसार के किसी भी प्राणी के प्रति यदि हम ईर्ष्या या द्वेष करते हैं, तो वह मानो स्वयं ईश्वर के प्रति ईर्ष्या करने के समान है। यही सभी प्राणियों में भगवान के दर्शन करने का सच्चा संदेश है।
संत तुकाराम महाराज का संदेश: जाति-भेद छोड़कर सबमें ईश्वर को देखें। हज़ारों वर्षों से समाज में ऊँच-नीच, छुआछूत और जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए संतों, समाज-सुधारकों, नेताओं और विचारकों ने निरंतर प्रयास किए हैं। लेकिन हिंदू धर्म, जो सहिष्णुता और सर्वसमावेशिता का संदेश देता है, उसका पालन करने वाले हम लोग उन प्रयासों का कितना साथ दे रहे हैं? यदि ईमानदारी से देखें तो बहुत कम।
‘विष्णु’ नाम का अर्थ है—जो कण-कण में व्याप्त है। सृष्टि के प्रत्येक कण में भगवान विष्णु का ही वास है; यही हमारा वैष्णव धर्म है। मेरे हृदय में जो विष्णु हैं, वही तुम्हारे हृदय में भी हैं। फिर भेद की कोई जगह ही कहाँ बचती है? बाहरी भिन्नता तो माया का भ्रम है, भीतर की एकता ही शाश्वत सत्य है। यदि विश्वास न हो तो भागवत, उपनिषद, गीता और वेदों का अध्ययन करके देखो और इस सनातन सत्य को स्वीकार करके अपना कल्याण करो। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विवेक से विचार करके उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए।
जब ईश्वर प्रत्येक जीव में व्याप्त है, तो उसकी पूजा करने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं। किसी भी प्राणी से ईर्ष्या मत करो, उसके साथ भेदभाव मत करो, यही सर्वेश्वर की सच्ची पूजा है। हम सब उसी परमब्रह्म के विराट स्वरूप के अंग हैं। सबको सुख-दुःख समान रूप से अनुभव होते हैं। मैं सुख में प्रसन्न होता हूँ, तुम भी होते हो; मैं दुःख में रोता हूँ, तुम भी रोते हो। फिर भेद कैसा? इसलिए दूसरों के आँसू पोंछो, उन्हें सुख बाँटो, ईश्वर का परिचय कराओ और वैदिक धर्म के इस एकत्व के संदेश को फैलाओ—यही परमेश्वर की वास्तविक पूजा है।
Credit the Video : Priyanka Barve YouTube Channel
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