हिंदू धर्म में “मंदिर” शब्द सुनते ही मन में एक पवित्र, शांत और दिव्य जगह का चित्र उभर आता है। संस्कृत के दो शब्दों “मन” (मन) और “दिर” (घर) से मिलकर बना यह शब्द सीधा-सादा अर्थ बताता है – “मन का घर” या “जहाँ मन को शांति मिले”। लेकिन आम बोलचाल में मंदिर का मतलब है – भगवान का घर, ईश्वर का निवास स्थान।
हर सुबह सूरज उगने से पहले ही लाखों लोग घर से निकल पड़ते हैं। कोई पैदल, कोई साइकिल से, कोई बस या मेट्रो में – सबकी मंजिल एक ही – मंदिर। क्यों? क्योंकि हिंदू मानता है कि मंदिर केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा का केंद्र है। वहाँ भगवान सचमुच विराजमान हैं।
सुबह चार बजे वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में पहली आरती शुरू होते ही घंटियों-शंखों की ध्वनि पूरे शहर को जगा देती है। दिल्ली के झंडेवालान मंदिर में माँ की जयकारे गूँजते हैं। तिरुपति बालाजी में लाइन लगी रहती है – लोग घंटों इंतजार करते हैं, बस एक झलक पाने के लिए। दक्षिण में मदुरै मीनाक्षी मंदिर, पश्चिम में सिद्धिविनायक, उत्तर में वैष्णो देवी – हर कोने में मंदिर ही मंदिर।
लोग मंदिर क्यों जाते हैं रोज?
- कोई धन्यवाद देने जाता है – “हे प्रभु, कल जो माँगा था, वो मिल गया”
- कोई दुख बाँटने जाता है – “बस एक बार दर्शन दे दो, सब ठीक हो जाएगा”
- कोई सिर्फ शांति के लिए – दो मिनट आँख बंद करके बैठ जाए, सारा तनाव गायब
- बच्चे परीक्षा से पहले, नौजवान नौकरी के इंटरव्यू से पहले, बुजुर्ग बीमारी में – सब मंदिर पहुँचते हैं।
मंदिर में प्रवेश करते ही जूते बाहर, मोबाइल साइलेंट, मन शांत। घंटी बजाई, फूल चढ़ाए, प्रसाद लिया, माथा टेका। बस इतने में ही सारी थकान मिट जाती है। यही कारण है कि भारत में 20 लाख से ज्यादा मंदिर हैं – छोटे-बड़े, गाँव के पेड़ के नीचे वाला देवस्थान से लेकर सोने से बना स्वर्ण मंदिर तक।
आज भी जब दुनिया भाग रही है, सुबह 5 बजे मंदिर के पट खुलते हैं तो सबसे पहले पहुँचने वाले वो भक्त होते हैं जो रात से लाइन में लगे थे। उनके चेहरे पर न थकान, न शिकन – सिर्फ एक मुस्कान और विश्वास कि “भगवान देख रहे हैं”।
मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं, हिंदुस्तान की आत्मा है। यहाँ आकर हर इंसान एक जैसा हो जाता है – अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा सब बराबर। यही मंदिर का असली अर्थ है – मन का घर, विश्वास का घर, प्रेम का घर।
