May 6, 2026
Ashtakam

Kashi Vishwanath Ashtakam | गंगा तरंग रमणीय जटा कलापं गौरी निरंतर विभूषित वाम भागं | श्री विश्वनाथाष्टकम्

Kashi Vishwanath Ashtakam

Kashi Vishwanath Ashtakam | गंगा तरंग रमणीय जटा कलापं गौरी निरंतर विभूषित वाम भागं | श्री विश्वनाथाष्टकम्: दोस्तों नमस्कार, आज हम आपको इस लेख के जरिए श्री विश्वनाथाष्टकम्  के बारे में बात करेंगे। श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम की रचना श्री वेदव्यास महर्षि द्वारा की गई है। इस में कुल आठ श्लोक हैं, जो भगवान शिव की स्तुति और प्रार्थना के रूप में रचे गए हैं।
विश्वनाथ का अर्थ है — समस्त ब्रह्मांड के स्वामी। यह काशी विश्वनाथ की महिमा, करुणा और दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है, तथा भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मोक्ष की ओर प्रेरित करता है।

श्री विश्वनाथाष्टकम्

विश्वनाथाष्टकम्‌

गंगातरंग रमणीयजटाकलापम्‌
गौरी निरन्तर विभूषितवामभागम्‌ ।
नारायण प्रियमनन्ग मदापहारम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ १ ॥

वाचामगॊचर मनॆक गुणस्वरूपम्‌
वागीश विष्णुसुरसॆवित पादपीठम्‌ ।
वामॆन विग्रहवरॆण कळत्रवंतं
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ २ ॥

भूताधिपं भुजग भूषण भूषितांगम्‌
व्याघ्राजिनांबर धरं जटिलं त्रिनॆत्रम्‌ ।
पाशांकुशाभय वरप्रद शूलपाणिम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ३ ॥

शीतांशु शॊभित किरीटविराज मानम्‌
पालॆक्षणानल विशॊषित पंचबाणम्‌ ।
नागाधिपारचित भासुर कर्णपूरम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ४ ॥

पंचाननं दुरितमत्त मातंगजानम्‌
नागांतकं दनुजपुंगव पन्नगानाम्‌ ।
दावानलं मरणशॊकजराटवीनाम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ५ ॥

तॆजॊमयं सुगुण निर्गुण मद्वितीयम्‌
मानंदकंद मपराजित मप्रमॆयम्‌ ।
नादात्मकं सकळ्निष्कळ मातृरूपं
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ६ ॥

आशां विहाय परिहृत्य परस्य निंदा
पापॆ रतिं च सुनिवार्य मनस्समाधौ ।
आदाय हृत्कमल मध्यगतं परॆशम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ७ ॥

रागादि दॊषरहितं स्वजनानुराग
वैराग्य शांतिनिलयं गिरिजा सहायकं ।
माधुर्य धैर्यसुभगं गरळाभि रामम्‌
वाराणसि पुरपतिं भज विश्वनाथम्‌ ॥ ८ ॥

वाराणसीपुरपतॆ: स्तवनं शिवस्य
व्यासॊक्त मष्टकमिदं पठतॆ मनुष्य: ।
विद्यां श्रीयं विपुल सौख्य मनंतकीर्तिं
संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌
विश्वनाथाष्टकमिदं य: पठॆच्छिवसन्निधौ
शिवलॊक मवाप्नॊति शिवॆनसहमॊदतॆ

॥ इती श्रीमद्वॆदव्यासविरचित विश्वनाथाष्टकं संपूर्णम्‌ ॥

Kashi Vishwanath Ashtakam

Ganga Taranga Ramaniya

Vishwanatha Ashtakam

Ganga Tharanga Ramaneeya Jata Kalapam
Gowri Niranthara Vibhooshitha Vama Bhagam
Narayana Priya Mananga Madapaharam
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 1 ॥

Vachamagochara Maneka Guna Swaroopam
Vageesa Vishnu Sura Sevitha Pada Pitham
Vamena Vigraha Varena Kalathravantham
Varanasi pura pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 2 ॥

Bhoothadhipam Bhujaga Bhooshana Bhooshithangam
Vygrajinambaradharam Jatilam Trinethram
Pasungusa Bhaya Vara Pradha Soola Panim
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 3 ॥

Seethamsu Shobitha Kireeta Virajamanam
Phaalekshananila Visoshitha Pancha Banam
Nagadhiparachitha Basaura Karma Pooram
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 4 ॥

Panchananam Durutha Matha Mathangajanaam
Naganthagam Danuja Pungava Pannaganam
Davanalam Marana Soka Jarataveenam
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 5 ॥

Thejomayam Suguna Nirgunamadweetheeyam
Anandakanda Maparajitha Maprameyam
Nagathmakam Sakala Nishkalamathma Roopam
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 6 ॥

Aasam Vihaya Parihruthya Parasya Nindam
Pape Rathim Cha Sunivarya Mana Samadhou
Aadhaya Hruth Kamala Madhya Gatham Paresam
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 7 ॥

Ragadhi Dosha Rahitham Sujananuraga
Vairagya Santhi Nilayam Girija Sahayam
Madhurya Dhairya Subhagam Garalabhi Ramam
Varanasi Pura Pathim Bhajhe Viswanadham ॥ 8 ॥

Varanasi Pura Pathe Sthavanam Sivasya
Vyakhyathamashtakamitham Patahe Manushya
Vidhyam Sriyaam Vipula Soukhya Manantha Keerthim
Samprapya Deva Nilaye Labhathe Cha Moksham

॥ Visvanadhastakamidam Punyam Yah Patheh Siva Sannidhau
Sivalokamavapnoti Sivenasaha Modate ॥

ବିଶ୍ଵନାଥାଷ୍ଟକମ୍‌

ଗଂଗାତରଂଗ ରମଣୀୟଜଟାକଲାପମ୍‌
ଗୌରୀ ନିରନ୍ତର ବିଭୂଷିତବାମଭାଗମ୍‌ |
ନାରାୟଣ ପ୍ରିୟମନନ୍ଗ ମଦାପହାରମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୧ ॥

ବାଚାମଗୋଚର ମନେକ ଗୁଣସ୍ଵରୂପମ୍‌
ବାଗୀଶ ବିଷ୍ଣୁସୁରସେବିତ ପାଦପୀଠମ୍‌ |
ବାମେନ ବିଗ୍ରହବରେଣ କଳତ୍ରବଂତଂ
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୨ ॥

ଭୂତାଧିପଂ ଭୁଜଗ ଭୂଷଣ ଭୂଷିତାଂଗମ୍‌
ବ୍ୟାଘ୍ରାଜିନାଂବର ଧରଂ ଜଟିଲଂ ତ୍ରିନେତ୍ରମ୍‌ |
ପାଶାଂକୁଶାଭୟ ବରପ୍ରଦ ଶୂଲପାଣିମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୩ ॥

ଶୀତାଂଶୁ ଶୋଭିତ କିରୀଟବିରାଜ ମାନମ୍‌
ପାଲେକ୍ଷଣାନଲ ବିଶୋଷିତ ପଂଚବାଣମ୍‌ |
ନାଗାଧିପାରଚିତ ଭାସୁର କର୍ଣପୂରମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୪ ॥

ପଂଚାନନଂ ଦୁରିତମତ୍ତ ମାତଂଗଜାନମ୍‌
ନାଗାଂତକଂ ଦନୁଜପୁଂଗବ ପନ୍ନଗାନାମ୍‌ |
ଦାବାନଲଂ ମରଣଶୋକଜରାଟବୀନାମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୫ ॥

ତେଜୋମୟଂ ସୁଗୁଣ ନିର୍ଗୁଣ ମଦ୍ଵିତୀୟମ୍‌
ମାନଂଦକଂଦ ମପରାଜିତ ମପ୍ରମେୟମ୍‌ |
ନାଦାତ୍ମକଂ ସକଳ୍ନିଷ୍କଳ ମାତୃରୂପଂ
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୬ ॥

ଆଶାଂ ବିହାୟ ପରିହୃତ୍ୟ ପରସ୍ୟ ନିଂଦା
ପାପେ ରତିଂ ଚ ସୁନିବାର୍ୟ ମନସ୍ସମାଧୌ |
ଆଦାୟ ହୃତ୍କମଲ ମଧ୍ୟଗତଂ ପରେଶମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୭ ॥

ରାଗାଦି ଦୋଷରହିତଂ ସ୍ଵଜନାନୁରାଗ
ବୈରାଗ୍ୟ ଶାଂତିନିଲୟଂ ଗିରିଜା ସହାୟକଂ |
ମାଧୁର୍ୟ ଧୈର୍ୟସୁଭଗଂ ଗରଳାଭି ରାମମ୍‌
ବାରାଣସି ପୁରପତିଂ ଭଜ ବିଶ୍ଵନାଥମ୍‌ ॥ ୮ ॥

ବାରାଣସୀପୁରପତେ: ସ୍ତବନଂ ଶିବସ୍ୟ
ବ୍ୟାସୋକ୍ତ ମଷ୍ଟକମିଦଂ ପଠତେ ମନୁଷ୍ୟ: |
ବିଦ୍ୟାଂ ଶ୍ରୀୟଂ ବିପୁଲ ସୌଖ୍ୟ ମନଂତକୀର୍ତିଂ
ସଂପ୍ରାପ୍ୟ ଦେହବିଲୟେ ଲଭତେ ଚ ମୋକ୍ଷମ୍‌
ବିଶ୍ଵନାଥାଷ୍ଟକମିଦଂ ୟ: ପଠେଚ୍ଛିବସନ୍ନିଧୌ
ଶିବଲୋକ ମବାପ୍ନୋତି ଶିବେନସହମୋଦତେ

॥ ଇତୀ ଶ୍ରୀମଦ୍ଵେଦବ୍ୟାସବିରଚିତ ବିଶ୍ଵନାଥାଷ୍ଟକଂ ସଂପୂର୍ଣମ୍‌ ॥

अर्थ:
उस विश्व के स्वामी की स्तुति और गुणगान करो, जो काशी नगरी के अधिपति हैं, जिनके जटाजूट में गंगा की लहरें विराजमान हैं, जिनके बाएँ भाग में सदा गौरी सुशोभित रहती हैं,
जो भगवान नारायण के मित्र हैं, और जिन्होंने कामदेव के अहंकार का नाश किया।

उस विश्वनाथ की स्तुति करो, जो काशी के स्वामी हैं, जो वाणी और शब्दों से परे हैं, जो अनेक गुणों के भंडार हैं, जिनके कमल समान चरणों की पूजा ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता करते हैं,
और जो अपनी अर्धांगिनी को बाईं ओर धारण करते हैं।

उस विश्वनाथ का गुणगान करो, जो सभी प्राणियों के स्वामी हैं, जिनका शरीर सर्पों से अलंकृत है, जो बाघ की खाल धारण करते हैं, जिनकी जटाएं हैं,
जिनकी तीन आँखें हैं, जो त्रिशूल, पाश और अंकुश धारण करते हैं, और जो वरदान देने वाले हैं।

उस विश्वनाथ की स्तुति करो, जो चंद्रमा से सुशोभित मुकुट धारण करते हैं, जिन्होंने अपनी नेत्रों की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया, और जो सर्पराज को कर्णाभूषण के रूप में धारण करते हैं।

उस विश्वनाथ का गुणगान करो, जो अहंकार रूपी हाथी के लिए सिंह के समान हैं, जो सर्प समान असुरों के लिए पक्षीराज गरुड़ के समान हैं,
और जो दुख, मृत्यु और बुढ़ापे को नष्ट करने वाली अग्नि के समान हैं।

उस विश्वनाथ की स्तुति करो, जो तेजस्वी हैं, जो साकार और निराकार दोनों में प्रथम हैं, जो इस संसार के सुख के कारण हैं, जो कभी पराजित नहीं होते, जो तर्क से परे हैं, जो सभी प्राणियों के आत्मा हैं,
और जिनका स्वरूप शुद्ध और मिश्र दोनों है।

उस विश्वनाथ का गुणगान करो, जो काशी के स्वामी हैं, और जो आपके हृदय रूपी कमल में विराजमान हैं, जब वह हृदय इच्छाओं और दोषों से रहित हो,
पाप कर्मों से मुक्त हो, और गहन समाधि में स्थित हो।

उस विश्वनाथ की स्तुति करो, जो राग-द्वेष जैसे दोषों से रहित हैं, जो सज्जनों से प्रेम करते हैं, जो वैराग्य और शांति के धाम हैं,
जो पर्वत-पुत्री (पार्वती) के साथ हैं, जिनका रूप अत्यंत मधुर और वीरता से युक्त है, और जिन्होंने प्रबल विष को धारण किया है।

फलश्रुति:
जो मनुष्य इस अष्टक को उसके अर्थ सहित पढ़ता है, जो काशी के स्वामी भगवान शिव की स्तुति करता है, वह ज्ञान, धन, महान सुख और यश प्राप्त करता है,
और अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।

Credit the Video: Madhvi Madhukar YouTube Channel

Credit the Video: Stotra Ratnavali Karmakand YouTube Channel

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