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October 5, 2026
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रामायण से सबक: सिर्फ उनकी इच्छा पूरी होती है

भगवान की कृपा से जीवात्मा को शरीर मिलता है। कर्मों के हिसाब से। इस शरीर का सही इस्तेमाल करना चाहिए। उनकी पूजा में।

सबसे श्रेष्ठ पूजा है अंजलि मुद्रा। दोनों हथेलियां जोड़कर नमस्कार करना। एक संस्कृत श्लोक कहता है – ‘अंजलिः परमा मुद्रा क्षिप्रं देव प्रसादिनी’। मतलब, अंजलि सबसे ऊंची मुद्रा है। इससे जल्दी भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।

अंजलि शब्द का मतलब समझिए। ‘अं जलयति इति अंजलिः’। ‘अ’ यानी विष्णु भगवान। जो उनके नाम से हृदय पिघल जाता है। इतना आसान तरीका है भगवान को मनाने का।

लेकिन पिछले जन्मों में हमने अंजलि नहीं की। तभी तो इस धरती पर आए हैं। अंजलि करना भी भगवान की इच्छा पर निर्भर है। बिना उनकी मर्जी के कुछ नहीं होता।

रामायण देखिए। दशरथ चाहते थे राम राजा बनें। लेकिन राम वन चले गए। कैकेयी ने भरत को राजा बनाने की इच्छा की। पर भरत ने सिंहासन ठुकरा दिया। भरत ने राम से लौटने की विनती की। राम नहीं माने। आखिर में राम की चरण पादुकाएं ही गद्दी पर विराजमान हुईं।

साफ है। किसी की मर्जी नहीं चली। सिर्फ भगवान की चली। उनकी मर्जी ही सर्वोपरि है।

हम प्रयास करें। लेकिन प्रार्थना करें कि अंजलि करने की बुद्धि भी दें। क्योंकि बिना उनकी कृपा के कुछ संभव नहीं।

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