January 9, 2026
Blog

कर्म, ज्ञान, भक्ति: कौन सा पथ पहले?

राधा नाम की मधुर धुन में डूबा वराह घाट वृंदावन धाम के पावन वराह घाट पर , जहाँ यमुना की लहरें भक्ति की लय में थिरकती हैं , सायंकाल का सूरज डूबते ही एक अनमोल सत्संग का आलम छा गया । सैकड़ों श्रद्धालु , अपने हृदय में आध्यात्मिक प्यास लिए , श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के दर्शन और वचनों को सुनने को आतुर थे । जैसे ही महाराज ने राधा नाम का संकीर्तन शुरू किया , उनकी मधुर वाणी ने वातावरण को शांति और प्रेम के आवरण में लपेट लिया ।

भजन का समय दस मिनट या सारा दिन ?

सत्संग में प्रश्नों की गंगा बही । एक जिज्ञासु ने पूछा , “क्या दस मिनट का भजन पूरे दिन की भक्ति के समान फल दे सकता है ?” महाराज ने मुस्कान के साथ जवाब दिया , “दस मिनट का भजन एक बीज है , जो हृदय में प्रेम का अंकुर बोता है । लेकिन जब जीवन का हर पल भजनमय हो जाए , जब सांसारिक कार्य भी भक्ति की छांव में हों , तब वह बीज वृक्ष बन फलता है ।” उनके शब्दों ने आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भक्ति का सार समझाया । नाम-जप की यात्रा मध्यम से परा तक एक अन्य साधक ने नाम-जप के मध्यम , पश्यंती और परा स्तरों की गहराई समझनी चाही । महाराज ने बताया , “यह एक नदी की तरह है ।

पहले शब्द हैं , फिर भावनाएँ , और अंत में एकता—जहाँ भक्त और भगवान का संवाद मौन हो जाता है ।” उन्होंने सिखाया कि यह यात्रा प्रयास और कृपा दोनों से संनादति है । “निरंतर अभ्यास से हृदय शुद्ध होता है , और कृपा उस शुद्धता में खिलती है ।” धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष क्या ये भगवान तक ले जाएँगे ? सत्संग में जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष—पर भी चर्चा हुई ।

एक सवाल था , “क्या ये पुरुषार्थ भगवद्-प्राप्ति करा सकते हैं ?” महाराज ने कहा , “ये चारों जीवन को संतुलित करते हैं , पर भक्ति का अनुपम रस , आत्म-समर्पण और प्रेम ही वह स्वर्णिम मार्ग है जो भगवान तक ले जाता है ।” उनकी बातों में शास्त्र और सरलता का अनूठा संगम था । गुरु-शिष्य का बंधन प्रेम और समर्पण की कसौटी गुरु-शिष्य संबंध पर सवाल उठा , “शिष्य गुरु का स्वरूप कैसे पहचाने ?”

महाराज के शब्दों में गहराई थी “जब शिष्य का अहंकार पिघलता है और हृदय भक्ति से भरता है , तब गुरु केवल शिक्षक नहीं , बल्कि दैवीय कृपा का साकार रूप बन जाते हैं ।” उनके जवाब ने गुरु के प्रति श्रद्धा को और गहरा कर दिया । कर्म , ज्ञान , भक्ति कौन सा पथ पहले ? जब एक साधक ने पूछा कि कर्म , ज्ञान और भक्ति में से किसे प्राथमिकता देनी चाहिए , महाराज ने एक कहानी सुनाई । “एक छोटा-सा समर्पित कार्य , अगर प्रेम और श्रद्धा से किया जाए , तो वह भगवान का आह्वान करता है ।” उन्होंने जीवन को एक रंगमंच बताया , जहाँ भक्त को नन्हा सा किरदार भी हिम्मत और आनंद से निभाना है । क्या इच्छाएँ पूरी होने से भक्ति कमजोर पड़ती है ?

सत्संग के अंत में कुछ गहरे प्रश्न आए । क्या अनायास पूरी हुई इच्छाएँ भजन की शक्ति को कम करती हैं ? क्या गुरु-शिष्य का रिश्ता पूर्वनियोजित है ? क्या सभी को भक्ति अपनानी चाहिए या कर्म और ज्ञान के पथ पर चलना चाहिए ? महाराज ने हर सवाल का जवाब धैर्य और प्रेम से दिया । “हर साधक का मार्ग अनूठा है ।

भगवान हर रिश्ते और पथ को प्रेम से गढ़ते हैं ।” मृत्यु से बचाव भगवान की कृपा का संदेश महाराज ने एक मार्मिक बात कही “जब कोई मृत्यु के करीब से लौटता है , तो यह भगवान की कृपा का संदेश है—जीवन को और गहराई से जीने , भक्ति को और मजबूत करने का ।” उन्होंने भजन के दौरान मन में उठने वाले ख्यालों को भी भक्ति में समाहित करने की सलाह दी ।

सत्संग का अमृत वचनों में नहीं , सान्निध्य में जैसे-जैसे सूरज डूबा , वराह घाट पर उपस्थित चेहरों पर स्पष्टता और शांति की चमक थी । सत्संग का असली अमृत केवल जवाबों में नहीं , बल्कि महाराज के जीवंत सान्निध्य और वृंदावन की पवित्र भूमि में था । यह सायंकाल न केवल प्रश्नों का समाधान लाया , बल्कि भक्ति के रस को हृदय में गहरा गया ।

Related posts

अवधेशानंद गिरी महाराज: जीवन को समझने और नकारात्मक विचारों को दूर करने की प्रेरणा

Bimal Kumar Dash

नुआखाई: पश्चिमी ओडिशा में नई फसल की खुशी और आध्यात्मिक एकता का महोत्सव

Bimal Kumar Dash

Nama Ramayanam | Ramayanam in 108 Stanzas | Life Story of Shri Rama

bbkbbsr24