21.1 C
Bhubaneswar
February 6, 2026
Blog

आत्मा, श्राद्ध और पुनर्जन्म की गुत्थी, सदियों पुराना सवाल, आज भी अनुत्तरित

दिल्ली निवासी सोनू का सवाल कुछ ऐसा था जो हर धर्मप्रेमी के मन में कभी न कभी उठता है। पूज्य श्री प्रेमानंद महाराज के सामने बैठकर उन्होंने वही पुराना प्रश्न दोहराया – “महाराज जी, अगर आत्मा अपने कर्मों के अनुसार नया जन्म लेती है, तो फिर हम श्राद्ध-तर्पण क्यों करते हैं? जो आत्मा किसी और शरीर या लोक में पहुंच गई हो, उसे हमारे पुण्य का लाभ कैसे मिल सकता है?” महाराज की करुणामय आंखों में एक मुस्कान तैरी। उनकी आवाज में वह शांति थी जो सुनने वाले के दिल तक पहुंच जाती है।

प्रेम की लहरें कभी नहीं भटकतीं

“बेटा,” महाराज ने समझाया, “आत्मा वास्तव में अपने कर्मों का हिसाब लेकर नए शरीर में जाती है। लेकिन श्राद्ध और तर्पण सिर्फ कर्मकांड नहीं हैं – ये हमारे प्रेम और श्रद्धा की तरंगें हैं। ये तरंगें आत्मा को खोज लेती हैं, चाहे वह किसी भी योनि में क्यों न हो।”

उन्होंने सरल उदाहरण देकर समझाया, “मान लो कोई आत्मा कुत्ते के रूप में जन्मी है, तो हमारा पुण्य उसे बेहतर जीवन की ओर ले जाता है। यदि मनुष्य योनि में है, तो और भी उन्नति होती है। प्रेम से किया गया कोई भी कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता।”

बचपन में बिछड़े माता-पिता की सेवा कैसे करें?

सभागार में बैठे एक युवक का दिल भर आया। वह आगे बढ़ा और कांपती आवाज में बोला, “महाराज जी, मेरे माता-पिता का देहांत मेरे बचपन में ही हो गया था। मैं उनकी सेवा नहीं कर पाया। अब मैं क्या करूं?”

महाराज का चेहरा ममता से भर गया। “पुत्र, उनके नाम पर भगवान का नाम लो। हर जाप, हर प्रार्थना सीधे उन तक पहुंचती है। चाहे वे आज किसी भी रूप में हों, तुम्हारा प्रेम उन्हें उन्नति देगा। हो सकता है एक दिन वे परमात्मा के चरणों में विलीन हो जाएं।”

बिछड़ने का दुख कैसे सहें?

एक अन्य व्यक्ति ने रुंधे गले से पूछा, “महाराज जी, जब हम जानते हैं कि हमारे प्रिय कहीं तो हैं, लेकिन हम उन्हें न छू सकते हैं, न देख सकते हैं – तो यह पीड़ा कैसे झेलें?”

महाराज ने गहरी सांस भरी। “देखो बेटे, यह संसार माया का जाल है। बिछड़ने का दुख तब तक है जब तक ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद दिखता है। सच्चाई यह है कि हर जीव में वही परमात्मा बसता है। कोई पराया नहीं, कोई अलग नहीं।”

हर जगह प्रभु के दर्शन

“यमुना की लहरों में, वृक्षों की छाया में, अनजान लोगों की आंखों में – सबमें वही ईश्वर विराजमान है,” महाराज ने आगे कहा। “संत महापुरुष हर स्थान पर अपने इष्ट के दर्शन करते हैं। उनके लिए हर नदी गंगा है, हर वृक्ष पीपल है। जब दृष्टि बदलती है, तो यह संसार प्रभु का मंदिर बन जाता है। फिर कोई खोता नहीं, कोई बिछड़ता नहीं।”

भक्ति का सरल मार्ग

अपनी बात समाप्त करते हुए महाराज ने कहा, “नाम जपो, सेवा करो, प्रेम करो। तुम्हारा हर प्रयास, हर याद, हर प्रार्थना सुनी जाती है। प्रेम से किया गया काम कभी बेकार नहीं जाता। जब मन भक्ति में डूब जाता है, तो यह दुनिया तीर्थ बन जाती है और मन को असीम शांति मिलती है।”

महाराज के मधुर वचनों के बाद सभागार में गहरा मौन छा गया। यह मौन खालीपन का नहीं बल्कि उस अनुभूति से भरा था जो जीवित और मृत, सृष्टि के कण-कण को एक अनमोल धागे में पिरो देती है।

श्राद्ध और तर्पण केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि प्रेम और श्रद्धा के वे सेतु हैं जो आत्मा को हमेशा जोड़े रखते हैं – चाहे वह कहीं भी हो, किसी भी रूप में हो।

Related posts

चंद्र ग्रहण 7 सितंबर 2025: जीवन बदलने वाली आध्यात्मिक प्रथाएं

Bimal Kumar Dash

Sojugada Sooju Mallige

bbkbbsr24

दुर्गा पूजा में संधि पूजा का महत्व: सबसे पवित्र और शक्तिशाली रस्म

Bimal Kumar Dash