Govind Damodar Stotram – English – BhaktiBharatKi

The word “Govind” means pleasure, “Damodar” means self-control. One who is the bosom of the entire universe. The words are described and defined from “Sanskrit” and signifies the lord with one of the most wonderful expressions to address Lord Krishna.

Sri Govind Damodar Stotra was composed by Sage Bilvamangala Thakur, who is also known as Lila Sukha. He has crafted and carved the importance of Govind Damodar Stotra in vibrant ways that delicacies the charm of Lord Krishna. It is a devotional and divine hymn of Lord Krishna. It is sung by Krishna devotees and it is also called Balamukund Ashtakam. You can chant this stotra to get a peaceful and happy life.

Through this stotra there are many benefits and merits obtained and ascertained:

Gracious life:

Govind Damodar Stotra gives grace to life. The Govind Damodar Stotra gives an internal pleasure among the people which gives a peace of satisfaction to mind, heart and body.

Peace:

Govind Damodar Stotra fabricates peace and pleasure to our human body, mind, heart and soul. This delegates positivity and peaceful start of meditation inclined in deep breath with slight chanting of mantras with devotion and dedication.

Essence of Vedas:

Scholars and Brahmins have composed the significance and importance of Vedas descriptive with the hymns and poetic devices of god and goddess. This flows throughout our life with a lot of symbolic and versatile meaning in our human activities in this dynamic world.

Positivity and Pleasure:

Govind Damodar Stotra proffers positivity throughout the body, mind, soul and overwhelms the stotra’s explanation in the heart. A person who recites Govind Damodar Stotra experienced positivity and pleasure in their life with acceleration and growth of optimism.

Lowers Blood pressure:

A person who recites Govind Damodar Stotra discovers the reduction and decrease in blood pressure. Chanting of mantra and slokas everyday lowers blood pressure, normalises heart beat rate, brain wave pattern, adrenaline levels, and even reduces high cholesterol levels.

Why should we recite Govind Damodar Stotra?

Govind Damodar Stotra renders peace for those who are suffering from stress, depression, mental agony, and disturbances should recite Govind Damodar Stotra. This mantra focuses on vedas and the purity of presence of Lord Krishna. The vedas are more trustable and evident of the facts of god and goddess.

Conclusion:

Anyone who recites or chants this stotra would attain complete tranquillity and sincere harmony through Govind Damodar Stotra. Together let’s chant this mantra and attain the best essence of purity and divinity. Govind Damodar fades away all your stress and tension, it is the best treatment for negativity and fabricates positivity when you chant this sloka. Chanting this mantra increases skills of rem

Govind Damodar Stotram

Credit the Video: GITAMRITAM – The essence of all Vedas YouTube Channel

Govinda Damodara Stotram in English

Kararavinde Na Padaravindam
Mukharavinde Viniveshayantam |
Vatasya Patrasya Pute Shayanam
Balam Mukundam Mansa Smarami ||1||

Shri Krishna Govind Hare Murari
Hey Nath Narayan Vasudeva |
Jivhe Pib-sva-mrita-metadeva
Govinda Damodar Madhaveti ||2||

Vikretukama Kila Gopakanya
Murari-Padarpita-Citta-Vrittih: |
Dadhyadikam Mohavasad-avochad
Govinda Damodar Madhaveti ||3||

Grihe Grihe Gopavadhu Kadambah:
Sarve Militva Samavapya Yogam |
Punyani Namani Pathanti Nityam
Govinda Damodar Madhaveti ||4||

Sukha Sayana Nilaye Nije-Api
Namani Vishno Pravadanti Martya |
Te Nishchitam Tanmayatam Vrajadanti
Govinda Damodar Madhaveti ||5||

Jivhe Sadaivam Bhaja Sundarani
Namani Krishnasya Manoharani |
Samasta Bhaktarti Vinashanani
Govinda Damodar Madhaveti ||6||

Sukhavasane Idameva Saram
Dukhavasane Idameva Geyam |
Dehavasane Idameva Jaapyam
Govinda Damodar Madhaveti ||7||

Shri Krishna Radhavara Gokulesa
Gopal Govardhana Nath Vishno |
Jivhe Pib-sva-mrita-metadeva
Govinda Damodar Madhaveti ||8||

Jihve rasagne Madhur Priya Twam
Satyam Hitam Tvam Parmam Vadami |
Aavarana Yetha Madhuraksharani
Govind Damodar Madhaveti ||9||

Tvameva Yache Mam Dehi Jihave
Samagte Dand Dhare Krutante |
Vaktvya Mevam Madhuram Subhakta
Govind Damodar Madhaveti ||10||

ShrInatha Vishveshvara Vishva-Murte
ShrI DevakI-Nandana Daitya-Shatro |
Jihve Pibasva Mrita Meta Deva
Govinda Damodara Madhaveti ||11.||

GopIpate Kansa-Ripo Mukunda
LakshmIpate Keshava Vasudeva |
Jihve Pibasva Mrita Meta Deva
Govinda Damodara Madhaveti ||12.||

Credit the Video: Ashit Desai – Topic YouTube Channel

श्री बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा रचित श्री गोविंद दामोदर स्तोत्रम। यदि आप नियमित रूप से श्री गोविंद दामोदर स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो भगवान भक्त के मन में प्रवेश करते हैं और उनकी सभी अशुद्धियों को धो देते हैं। भक्त का मन और विवेक और हृदय एक दर्पण बन जाते हैं और मोक्ष देते हैं यदि श्री गोविंद दामोदर स्तोत्र का पाठ भक्ति के साथ किया जाता है, तो भगवान स्वयं मनुष्य के सभी दुखों को दूर करते हैं और उसे विपत्तियों से मुक्त करते हैं।

गोविन्द दामोदर स्तोत्र

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।

विक्रेतुकामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्ति:।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।

गृहे गृहे गोपवधूकदम्बा: सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगम्।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णो: प्रवदन्ति मर्त्या:।
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।

जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि।
समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।

सुखावसाने इदमेव सारं दु:खावसाने इदमेव ज्ञेयम्।
देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

जिह्वे रसज्ञे मधुर प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।

श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।

Credit the Video: HOPEAD TV Topic YouTube Channel

ଶ୍ରୀ ଗୋବିନ୍ଦା ଦାମୋଦର ଷ୍ଟୋଟ୍ରାମ ଶ୍ରୀବିଲଭାମଙ୍ଗଲ ଠାକୁରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ରଚନା କରାଯାଇଛି | ଶ୍ରୀ ଗୋବିନ୍ଦ ଦାମୋଦର ଷ୍ଟୋଟ୍ରାମକୁ ନିୟମିତ ପାଠ କରିବା ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଭୁ ଭକ୍ତ ମନରେ ପ୍ରବେଶ କରି ତାର ସମସ୍ତ ଅଶୁଦ୍ଧତା ଧୋଇ ଦିଅନ୍ତି | ଭକ୍ତର ମନ ଏବଂ ବିବେକ ଓ ଅନ୍ତଃକରଣ ରୁପି ଦର୍ପଣ ପରିଷ୍କାର ହେବା ସହିତ ପରିତ୍ରାଣ ଦେଇଥାଏ | ଯଦି ଶ୍ରୀ ଗୋବିନ୍ଦ ଦାମୋଦର ଷ୍ଟୋଟ୍ରାମକୁ ଭକ୍ତି ସହିତ ପାଠ କରାଯାଏ, ସେତେବେଳେ ପ୍ରଭୁ ନିଜେ ମନୁଷ୍ୟର ସମସ୍ତ ଦୁଃଖ ଦୂର କରନ୍ତି ଓ ବିପର୍ଯ୍ୟୟରୁ ମୁକ୍ତ କରନ୍ତି |

ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ସ୍ତୋତ୍ରମ୍

କରାରବିନ୍ଦେ ନା ପଦାରବିନ୍ଦମ
ମୁଖାରବିନ୍ଦେ ବୀନିବେଷୟନ୍ତମ ।
ବଟସ୍ୟ ପତ୍ରସ୍ୟ ପୁଟେ ଶାୟନଂ
ବାଲମ ମୁକୁନ୍ଦମ ମନସା ସ୍ମରାମି ॥

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଗୋବିଂଦ ହରେ ମୁରାରେ
ହେ ନାଥ ନାରାୟଣ ବାସୁଦେବ ।
ଜିହ୍ଵେ ପିବସ୍ଵାମୃତମେତଦେବ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ବିକ୍ରେତୁକାମା ଖିଲ ଗୋପକନ୍ୟା
ମୁରାରି ପାଦାର୍ପିତ ଚିତ୍ତ ବୃତ୍ତିଃ ।
ଦଧ୍ୟାଦିକଂ ମୋହବଶାଦ ବୋଚତ୍
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଗୃହେ ଗୃହେ ଗୋପବଧୂ କଦଂବାଃ
ସର୍ବେ ମିଲିତ୍ଵା ସମବାପ୍ୟ ୟୋଗମ୍ ।
ପୁଣ୍ୟାନି ନାମାନି ପଠଂତି ନିତ୍ୟଂ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ସୁଖଂ ଶୟାନା ନିଲୟେ ନିଜେଽପି
ନାମାନି ବିଷ୍ଣୋଃ ପ୍ରବଦଂତି ମର୍ତ୍ୟାଃ ।
ତେ ନିଶ୍ଚିତଂ ତନ୍ମୟତାଂ ବ୍ରଜଂତି
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଜିହ୍ଵେ ସଦୈବଂ ଭଜ ସୁଂଦରାଣି
ନାମାନି କୃଷ୍ଣସ୍ୟ ମନୋହରାଣି ।
ସମସ୍ତ ଭକ୍ତାର୍ତି ବିନାଶନାନି
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ସୁଖାବସାନେ ଇଦମେବ ସାରଂ
ଦୁଃଖାବସାନେ ଇଦମେବ ଜ୍ଞେୟମ୍ ।
ଦେହାବସାନେ ଇଦମେବ ଜାପ୍ୟଂ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ରାଧାବର ଗୋକୁଲେଶ
ଗୋପାଲ ଗୋବର୍ଧନନାଥ ବିଷ୍ଣୋ ।
ଜିହ୍ଵେ ପିବସ୍ଵା ମୃତ ମେତଦେବ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଜିହ୍ଵେ ରସଜ୍ଞେ ମଧୁରପ୍ରିୟେ ତ୍ଵଂ
ସତ୍ୟଂ ହିତଂ ତ୍ଵାଂ ପରମଂ ବଦାମି ।
ଅବର୍ଣ ୟେଥା ମଧୁରାକ୍ଷରାଣି
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ତ୍ଵାମେବ ୟାଚେ ମମ ଦେହି ଜିହ୍ଵେ
ସମାଗତେ ଦଂଡଧରେ କୃତାଂତେ ।
ବକ୍ତବ୍ୟମେବଂ ମଧୁରଂ ସୁଭକ୍ତ୍ୟା
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଶ୍ରୀନାଥ ବିଶ୍ଵେଶ୍ଵର ବିଶ୍ବ ମୂର୍ତେ
ଶ୍ରୀ ଦେବକୀ ନନ୍ଦନ ଦୈତ୍ୟ ସହତ୍ର ସତ୍ରେ। ।
ଜିହ୍ଵେ ପିବସ୍ଵାମୃତମେତଦେବ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

ଗୋପୀପତେ କଂସ ରିପୋ ମୁକୁନ୍ଦ
ଲକ୍ଷ୍ମୀପତେ କେଶବ ବାସୁଦେବ ।
ଜିହ୍ଵେ ପିବସ୍ଵାମୃତମେତଦେବ
ଗୋବିଂଦ ଦାମୋଦର ମାଧବେତି ॥

Credit the Video: Rakesh Kumar Spiritual YouTube Channel

Credit the Video: soodz769 YouTube Channel

श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्र मूलपाठ

अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा ।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १॥

श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २॥

विक्रेतुकामा किल गोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः ।
दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३॥

उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च सङ्घट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः ।
गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४॥

काचित्कराम्भोजपुटे निषण्णं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम् ।
अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५॥

गृहे गृहे गोपवधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम् ।
स्खलद्गिरां वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६॥

पर्य्यङ्किकाभाजमलं कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिलगोपकन्याः ।
जगुः प्रबन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७॥

रामानुजं वीक्षणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।
आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८॥

विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहि वक्त्राम्बुजराजहंसि ।
सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९॥

अङ्काधिरूढं शिशुगोपगूढं स्तनं धयन्तं कमलैककान्तम् ।
सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १०॥

क्रीडन्तमन्तर्व्रजमात्मजं स्वं समं वयस्यैः पशुपालबालैः ।
प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११॥

यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमानः ।
रुरोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १२॥

निजाङ्गणे कङ्कणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।
आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १३॥

गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे ।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १४॥

मन्दारमूले वदनाभिरामं विम्बाधरे पूरितवेणुनादम् ।
गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १५॥

उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदसुतबालकेलिम् ।
गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १६॥

जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती ।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १७॥

अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्थ ।
गायन्ति गोप्योऽथ सखीसमेता गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १८॥

क्वचित् प्रभाते दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम् ।
आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १९॥

क्रीडापरं भोजनमज्जनार्थं हितैषिणी स्त्री तनुजं यशोदा ।
आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २०॥

सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः ।
तेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २१॥

विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः ।
वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २२॥

वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम् ।
राधां जगुः साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २३॥

प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थं तनयं यशोदा ।
प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २४॥

प्रवालशोभा इव दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः ।
मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २५॥

एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः ।
विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २६॥

गोपी कदाचिन्मणिपञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता ।
आनन्दकन्द व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २७॥

गोवत्सबालैः शिशुकाकपक्षं बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम् ।
उवाच माता चिबुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २८॥

प्रभातकाले वरवल्लवौघा गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डाः ।
आकारयामासुरनन्तमाद्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २९॥

जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः ।
गोपाङ्गनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३०॥

अक्रूरमासाद्य यदा मुकुन्दश्चापोत्सवार्थं मथुरां प्रविष्टः ।
तदा स पौरेर्जयसीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३१॥

कंसस्य दूतेन् यदैव नीतौ वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसूनुः ।
रुरोद गोपी भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३२॥

सरोवरे कालियनागबद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य ।
चक्रुर्लुठन्त्यः पथि गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३३॥

अक्रूरयाने यदुवंशनाथं सङ्गच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य ।
ऊचुर्वियोगत् किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३४॥

चक्रन्द गोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना ।
प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३५॥

मातापितृभ्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललाप गोपी ।
आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३६॥

वृन्दावनस्थं हरिमाशु बुद्ध्वा गोपी गता कापि वनं निशायाम् ।
तत्राप्यदृष्ट्वाऽतिभयादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३७॥

सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३८॥

सा नीरजाक्षीमवलोक्य राधां रुरोद गोविन्दवियोगखिन्नाम् ।
सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३९॥

जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि ।
आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४०॥

आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सकं वेदविदो वदन्ति ।
संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४१॥

ताताज्ञया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते ।
चक्रन्द रामस्य निजा जनित्री गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४२॥

एकाकिनी दण्डककाननान्तात् सा नीयमाना दशकन्धरेण ।
सीता तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४३॥

रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम् ।
रुरोद सीता रघुनाथ पाहि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४४॥

प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ सुरासुराणां सुखदुःखहेतो ।
रुरोद सीता तु समुद्रमध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४५॥

अन्तर्जले ग्राहगृहीतपादो विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः ।
तदा गजेन्द्रो नितरां जगाद गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४६॥

हंसध्वजः शङ्खयुतो ददर्श पुत्रं कटाहे प्रतपन्तमेनम् ।
पुण्यानि नामानि हरेर्जपन्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४७॥

दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चाब्रवीत् काननवासिनीशम् ।
अन्तः प्रविष्टं मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४८॥

ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयः चिन्ताहरश्चिन्तितपारिजातः ।
कस्तूरिकाकल्पितनीलवर्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४९॥

संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते ।
करावलम्बं मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५०॥

भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै जिह्वे रसज्ञे सुलभं मनोज्ञम् ।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः प्रजप्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५१॥

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५२॥

गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो ।
उच्चस्वरैस्त्वं वद सर्वदैव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५३॥

जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।
समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५४॥

गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण ।
गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५५॥

सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् ।
देहावसाने त्विदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५६॥

दुर्वारवाक्यं परिगुह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथञ्चित् ।
सभां प्रविष्टा मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५७॥

श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५८॥

श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५९॥

गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६०॥

गोपीजनाह्लादकर व्रजेश गोचारणारण्यकृतप्रवेश ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६१॥

प्राणेश विश्वम्भर कैटभारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६२॥

हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीतावर रावणारे ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६३॥

श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष गोगोपगोपीसुखदानदक्ष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६४॥

धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतबन्धुशेष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६५॥

बकीबकाघासुरधेनुकारे केशीतृणावर्तविघातदक्ष ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६६॥

श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६७॥

नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रह्लादबाधाहर हे कृपालो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६८॥

लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६९॥

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७०॥

वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७१॥

इति श्रीबिल्वमङ्गलाचार्य विरचितं श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

Govind Damodar Stotram

Credit the Image : The Spiritual Talks

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