नई दिल्ली: जिंदगी की भागदौड़ में हम अक्सर खुशी को बाहर तलाशते हैं। लेकिन प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु का कहना है कि सच्ची खुशी तो हमारे ही भीतर छिपी है। उनके ये शब्द न सिर्फ प्रेरणा देते हैं, बल्कि जीवन को नई दिशा भी दिखाते हैं। आइए, जानते हैं सद्गुरु के इस जीवन बदलने वाले संदेश को।
सुख-दुख का राज भीतर ही है
सद्गुरु कहते हैं कि दुनिया में कुछ भी बाहर नहीं है। सब कुछ आपके अंदर ही समाया हुआ है। पीड़ा हो या सुख, खुशी हो या गम—ये सब आपके भीतर से ही जन्म लेते हैं। बाहर जो कुछ घटित होता है, वह तो बस घटना है। लेकिन उसका अनुभव? वो आपके मन की उपज है।
जब कोई व्यक्ति कहता है, “मैं दुखी हूं,” तो असल में वह अपनी ही सोच से जूझ रहा होता है। हमारे विचार और भावनाएं ही सुख-दुख का मूल कारण हैं। सद्गुरु जोर देकर कहते हैं कि खुशी को बाहर ढूंढना व्यर्थ है। इसे समझना होगा।
न्यूरोलॉजिकल सिस्टम को समझें, बुद्धि को नियंत्रित करें
सद्गुरु आगे बताते हैं कि सोचना और महसूस करना—ये दोनों आपके वश में होने चाहिए। अगर आपके मन में जो कुछ चल रहा है, वो आपकी इच्छा से परे है, तो इसका मतलब साफ है। आपने अभी तक जीवन की गहराई नहीं छुई।
प्रकृति ने इंसान को सबसे उन्नत न्यूरोलॉजिकल सिस्टम दिया है। लेकिन हमने इसका यूजर मैनुअल कभी नहीं पढ़ा। नतीजा? वही बुद्धि, जो हमें आसमान छूने की ताकत दे सकती थी, अब हमारे खिलाफ हो गई है।
सद्गुरु मुस्कुराते हुए कहते हैं, “जीवन दुखी नहीं है। ये एक अद्भुत यात्रा है। अगर आप इसे सही से सवारें, तो ये सुंदर बनेगी। लेकिन अगर आप इसके नीचे दब जाएं, तो ये डरावनी हो जाएगी।”
इनर इंजीनियरिंग से बदलें जिंदगी का चाल
इनर इंजीनियरिंग क्या है? सद्गुरु के शब्दों में, ये अपने भीतर के यंत्र को समझने की कला है। इसे संतुलित बनाएं। सामंजस्य पैदा करें। हमने बाहर की दुनिया को तो घर, सड़कें, तकनीक से सजाया। लेकिन अंदर की मशीन? उसे संभालना भूल गए।
इसलिए बाहरी सुख बढ़े, लेकिन आंतरिक शांति गायब हो गई। सद्गुरु कहते हैं, “अगर आपकी बुद्धि आपके विरुद्ध हो जाए, तो कोई ताकत आपको बचा नहीं सकती।” दुनिया के दूसरे जीव अपने जीवन से इतना नहीं लड़ते, जितना इंसान करता है। वजह? हमारी अनियंत्रित बुद्धि।
हर हाल में दुख? वजह भीतर की है
चाहे अमीर हों या गरीब। शिक्षित हों या अनपढ़। शादीशुदा हों या अकेले। हर अवस्था में लोग दुखी क्यों हैं? सद्गुरु का जवाब सीधा है—कारण बाहर नहीं, भीतर है। आज के दौर में ये समझना बेहद जरूरी है।
अगर आपका आंतरिक संसार आपकी मर्जी से चले, तो दुख कहां बचेगा? लेकिन इसके लिए आनंद को गहराई से समझना पड़ेगा। सद्गुरु का ये संदेश सिर्फ शब्द नहीं, जीवन का मंत्र है। इसे अपनाएं, तो जिंदगी खिल उठेगी।
