मुश्किल वक्त में क्या करें? दुख हो, मन अस्थिर हो या कोई संकट आए, तो बड़े-बुजुर्गों और साधु पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए। उनकी बातें कभी गलत नहीं होतीं। वे हमेशा सही रास्ता दिखाते हैं।
ऐसा ही एक उदाहरण महाभारत से मिलता है। युद्ध के बाद युधिष्ठिर गहरे दुख में डूबे थे। वे डर और शोक से कांप रहे थे। तब भगवान कृष्ण उन्हें भीष्म पितामह के पास ले गए। भीष्म की कृष्ण भक्ति गंगा जैसी गहरी थी। उनका हृदय बिल्कुल शुद्ध था।
भीष्म ने युधिष्ठिर के सभी संदेह दूर किए। उन्होंने विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया। यह हितोपदेश था, जो जीवन को सही दिशा देता है।
भगवान के नाम अनंत हैं। एक संत कहते हैं, “देवो नाम सहस्राणाम” – ईश्वर के नाम हजारों हैं। आंडाल ने कहा, “नामम आयिरम एथा निंद्रा नारायणा” – नारायण के हजार से ज्यादा दिव्य नाम हैं।
इस स्तोत्र की महत्ता को कई आचार्यों ने माना। शंकराचार्य, मध्वाचार्य और पराशर भट्ट जैसे महान विद्वानों ने इस पर टीकाएं लिखीं।
एक दिलचस्प किस्सा कथांबरी ग्रंथ से आता है। कवि भट्ट भानर बताते हैं कि एक राजा ने अपनी रानी की प्रसव पीड़ा के समय पंडितों को बुलाया। उन्होंने विष्णु सहस्रनाम का जाप करवाया। इससे मां और बच्चे दोनों सुरक्षित रहे। बच्चे ने जन्म लेते ही दिव्य नाम सुने।
वेद व्यास जी ने कहा कि पूरा महाभारत का सार विष्णु सहस्रनाम में समाया है। भीष्म के पाठ को सुनने सभी ऋषि-मुनि आए थे। इसमें भगवद्गीता की तरह शरणागति का उपदेश है। इसे अपनाना आसान है।
जो लोग नियमित इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उनके जीवन में हर अच्छाई आती है। संकट दूर होते हैं। मन शांत रहता है। यह न केवल आध्यात्मिक बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए भी वरदान है।
विष्णु सहस्रनाम सिर्फ एक स्तोत्र नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक है। इसे अपनाएं, और देखें कैसे सब कुछ बदल जाता है।
