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May 28, 2024
Stotram

Shiva Tandav Stotram | शिव तांडव स्तोत्र | ଶିବ ତାଣ୍ଡବ ସ୍ତୋତ୍ରମ

Credit the Video: Wings of Mind by Shankar Mahadevan YouTube Channel

शिव तांडव स्तोत्र हिंदीमे – शिव तांडव स्तोत्रम की रचना रावण ने की थी। शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव को समर्पित है। इस शक्तिशाली स्तोत्र का पाठ करने से भगवान शिव की कृपा होती है।

शिव तांडव भगवान शिव द्वारा किया जाने वाला एक हिंदू नृत्य है, जिन्हें हिंदू पौराणिक कथाओं में नृत्य का स्वामी माना जाता है। यह नृत्य शिव के उग्र और विनाशकारी पहलुओं के साथ-साथ सृजन और विनाश के चक्र में उनकी भूमिका को दर्शाता है। तांडव आमतौर पर मंदिरों में, त्योहारों के दौरान और शास्त्रीय भारतीय नृत्य के प्रदर्शन में किया जाता है।

यह भगवान शिव द्वारा किया जाने वाला नृत्य है, जो उनके डरावने और विनाशकारी पहलू को दर्शाता है। हालाँकि, नृत्य को ब्रह्मांड के निर्माण, विनाश और निरंतरता का स्रोत माना जाता है।

Shiva Tandav Stotram

Jatatavigalajjala pravahapavitasthale
Galeavalambya lambitam bhujangatungamalikam ।
Damad damad damaddama ninadavadamarvayam
Chakara chandtandavam tanotu nah shivah shivam ॥ 1 ॥

Jata kata hasambhrama bhramanilimpanirjhari
Vilolavichivalarai virajamanamurdhani ।
Dhagadhagadhagajjva lalalata pattapavake
Kishora chandrashekhare ratih pratikshanam mama ॥ 2 ॥

Dharadharendrana ndinivilasabandhubandhura
Sphuradigantasantati pramodamanamanase ।
Krupakatakshadhorani nirudhadurdharapadi
Kvachidigambare manovinodametuvastuni ॥ 3 ॥

Jata bhujan gapingala sphuratphanamaniprabha
Kadambakunkuma dravapralipta digvadhumukhe ।
Madandha sindhu rasphuratvagutariyamedure
Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari ॥ 4 ॥

Sahasra lochana prabhritya sheshalekhashekhara
Prasuna dhulidhorani vidhusaranghripithabhuh ।
Bhujangaraja malaya nibaddhajatajutaka
Shriyai chiraya jayatam chakora bandhushekharah ॥ 5 ॥

Lalata chatvarajvaladhanajnjayasphulingabha
Nipitapajnchasayakam namannilimpanayakam ।
Sudha mayukha lekhaya virajamanashekharam
Maha kapali sampade shirojatalamastu nah ॥ 6 ॥

Karala bhala pattikadhagaddhagaddhagajjvala
Ddhanajnjaya hutikruta prachandapajnchasayake ।
Dharadharendra nandini kuchagrachitrapatraka
Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama ॥ 7 ॥

Navina megha mandali niruddhadurdharasphurat
Kuhu nishithinitamah prabandhabaddhakandharah ।
Nilimpanirjhari dharastanotu krutti sindhurah
Kalanidhanabandhurah shriyam jagaddhurandharah ॥ 8 ॥

Praphulla nila pankaja prapajnchakalimchatha
Vdambi kanthakandali raruchi prabaddhakandharam ।
Smarachchidam purachchhidam bhavachchidam makhachchidam
Gajachchidandhakachidam tamamtakachchidam bhaje ॥ 9 ॥

Akharvagarvasarvamangala kalakadambamajnjari
Rasapravaha madhuri vijrumbhana madhuvratam ।
Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam
Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje ॥ 10 ॥

Jayatvadabhravibhrama bhramadbhujangamasafur
Dhigdhigdhi nirgamatkarala bhaal havyavat ।
Dhimiddhimiddhimidhva nanmrudangatungamangala
Dhvanikramapravartita prachanda tandavah shivah ॥ 11 ॥

Drushadvichitratalpayor bhujanga mauktikasrajor
Garishtharatnaloshthayoh suhrudvipakshapakshayoh ।
Trushnaravindachakshushoh prajamahimahendrayoh
Sama pravartayanmanah kada sadashivam bhajamyaham ॥ 12 ॥

Kada nilimpanirjhari nikujnjakotare vasanh
Vimuktadurmatih sada shirah sthamajnjalim vahanh ।
Vimuktalolalochano lalamabhalalagnakah
Shiveti mantramuchcharan sada sukhi bhavamyaham ॥ 13 ॥

Imam hi nityameva muktamuttamottamam stavam
Pathansmaran bruvannaro vishuddhimeti santatam ।
Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim
Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam ॥ 14 ॥

Puja vasanasamaye dashavaktragitam
Yah shambhupujanaparam pathati pradoshhe ।
Tasya sthiram rathagajendraturangayuktam
Lakshmim sadaiva sumukhim pradadati shambhuh ॥ 15 ॥

॥ Ithi Sri Ravan Krutam Shiva Tandava Stotram Sampurnam ॥

शिव तांडव स्तोत्र

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥ १ ॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥ २ ॥

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥ ५ ॥

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥ ६ ॥

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥ ७ ॥

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥ ८ ॥

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥ १० ॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ १२ ॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥ १३ ॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥ १४ ॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥ १५ ॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥ १६ ॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥ १७ ॥

॥ इति श्री रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र समाप्त ॥

ଶିବ ତାଣ୍ଡବ ସ୍ତୋତ୍ରମ

ଜଟାଟବିଗଲଜ୍ଜଲ ପ୍ରବାହ ପାବିତସ୍ଥଲେ
ଗଲେବଲଂବ୍ୟ ଲଂବିତାଂ ଭୁଜଂଗତୁଂଗ ମାଲିକାମ୍ ।
ଡମଡ୍ଡମଡ୍ଡମଡ୍ଡମନ୍ନିନାଦ ବଡ୍ଡମର୍ବୟଂ
ଚକାର ଚଂଡତାଂଡବଂ ତନୋତୁ ନଃ ଶିବଃ ଶିବମ୍ ॥ ୧ ॥

ଜଟାକଟାହ ସଂଭ୍ରମଭ୍ରମନ୍ନିଲିଂପ ନିର୍ଝରୀ-
-ବିଲୋଲ ବିଚୀ ବଲ୍ଲରୀ ବିରାଜ ମାନ ମୁର୍ଧନି ।
ଧଗଦ୍ଧଗ ଦ୍ଧଗଜ୍ୱଲ ଲଲ୍ଲାଟ ପଟ୍ଟ୍ଟପାବକେ
କିଶୋର ଚଂନ୍ଦ୍ର ଶେଖରେ ରତିଃ ପ୍ରତିକ୍ଷଣଂ ମମ ॥ ୨ ॥

ଧରାଧରେଂଦ୍ର ନଂଦିନୀ ବିଲାସ ବଂଧୁ ବଂଧୁର
ସ୍ଫୁରଦ୍ଦିଗନ୍ତ ସନ୍ତାତି ପ୍ରମୋଦ ମାନ ମାନସେ ।
କୃପାକଟାକ୍ଷ ଧୋରଣୀ ନିରୁଦ୍ଧ ଦୁର୍ଧରାପଦି
କ୍ୱଚିଦ୍ଦିଗମ୍ବରେ ମନୋ ବିନୋଦମେତୁ ବସ୍ତୁନି ॥ ୩ ॥

ଜଟା ଭୁଜଂଗ ପିଂଗଳ ସ୍ଫୁରତଫଣା ମଣିପ୍ରଭା
କଦଂବ କୁଂକୁମ ଦ୍ରବ ପ୍ରଲିପ୍ତ ଦିଗ୍ବଧୂ ମୁଖେ ।
ମଦାଂଧ ସିଂଧୁର ସ୍ଫୁରତ ତ୍ୱଗୁତ୍ତରୀୟ ମେଦୁରେ
ମନୋ ବିନୋଦମଦ୍ଭୁତଂ ବିଭର୍ତୁ ଭୁତଭର୍ତରି ॥ ୪ ॥

ସହସ୍ର ଲୋଚନ ପ୍ରଭୁତ୍ୟ ଶେଷ ଲେଖ ଶେଖର
ପ୍ରସୁନ ଧୁଲି ଧୋରଣୀ ବିଧୁସରାଙ୍ଘ୍ରି ପିଠଭୁଃ ।
ଭୁଜଂଗ ରାଜ ମାଲୟା ନିବଦ୍ଧ ଜାଟ ଜୁଟକଃ
ଶ୍ରିୟୈ ଚିରାୟ ଜାୟତାଂ ଚକୋର ବନ୍ଧୁ ଶେଖରଃ ॥ ୫ ॥

ଲଲାଟ ଚତ୍ୱର ଜ୍ୱଲଦ୍ଧନଞ୍ଜୟ ସ୍ଫୁଲିଂଗଭା-
-ନିପୀତ ପଂଚ ସାୟକଂ ନମନ୍ନି ଲିଂପ ନାୟକଂ ।
ସୁଧା ମୟୁଖ ଲେଖୟା ବିରାଜ ମାନ ଶେଖରଂ
ମହା କପାଲି ସଂପଦେ ଶିରୋ ଜଟାଲ ମସ୍ତୁ ନଃ ॥ ୬ ॥

କରାଲ ଭାଲ ପଟ୍ଟିକା ଧଗଦ୍ଧଗ ଦ୍ଧଗଜ୍ୱଲଦ୍ଧନଂଜୟ-
(ଆ)ହୁତି କୃତ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ପଂଚ ସାୟକେ ।
ଧରା ଧରେଂଦ୍ର ନଂଦିନୀ କୁଚାଗ୍ର ଚିତ୍ର ପତ୍ରକ-
-ପ୍ରକଳ୍ପ ନୈକ ଶିଳ୍ପିନି ତ୍ରିଲୋଚନେ ରତିର୍ମମ ॥ ୭ ॥

ନବୀନ ମେଘ ମଣ୍ଡଳୀ ନିରୁଦ୍ଧ ଦୁର୍ଧରସ୍ଫୁର-
ତ୍କୁହୁ ନିଶୀଥିଣିତମଃ ପ୍ରବଂଧ ବଦ୍ଧ କଂଧର ।
ନିଲିଂପ ନିର୍ଝରୀ ଧରସ୍ତନୋତୁ କୃତିସିଂଧୁରଃ
କଲାନିଧାନ ବଂଧୁରଃ ଶ୍ରିୟଂ ଜଗଦ୍ଧରଂଧର ॥ ୮ ॥

ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ ନୀଲ ପଂକଜ ପ୍ରପଂଚ କାଲିମ ପ୍ରଭା-
-ବଲଂବି କଂଠ କଂଦଲୀ ରୁଚି ପ୍ରବଦ୍ଧ କଂଧରଂ ।
ସ୍ମରାଚ୍ଛିଦଂ ପୁରାଚ୍ଛିଦଂ ଭବଚ୍ଛିଦଂ ମଖଚ୍ଛିଦଂ
ଗଜାଚ୍ଛିଦାଂଧ କଚ୍ଛିଦଂ ତମଂତ କଚ୍ଛିଦଂ ଭଜେ ॥ ୯ ॥

ଅଖର୍ବ ସର୍ବ ମଂଗଳା କଳା କଦଂବ ମଂଜରୀ
ରସ ପ୍ରବାହ ମାଧୁରୀ ବିଜୃମ୍ଭଣାମଂ ଧୁବ୍ରତଂ ।
ସ୍ମରାନ୍ତକଂ ପୁରାନ୍ତକଂ ଭବାନ୍ତକଂ ମଖାନ୍ତକଂ
ଗଜାନ୍ତ କାନ୍ଧ କାନ୍ତକେ ତମଂତ କାନ୍ତକେ ଭଜେ ॥ ୧୦ ॥

ଜୟ ତ୍ୱଦଭ୍ର ବିଭ୍ରମ ଭ୍ରମଦ୍ଧଭୂଜଙ୍ଗମଶ୍ୱସ-
-ଦ୍ୱିନିରଗମତ୍କ୍ରମ ସ୍ଫୁରତ୍କରାଲ ଭାଲ ହବ୍ୟବାଟ୍ ।
ଧିମି ଧିମି ଧିମି ଧ୍ୱନନଂ ମୃଦଂଗ ତୁଂଗ ମଂଗଳ
ଧ୍ୱନି କ୍ରମ ପ୍ରବର୍ତିତ ପ୍ରଚଂଡ ତାଂଡବଃ ଶିବଃ ॥ ୧୧ ॥

ଦୃଷଦ୍ବିଚତ୍ର ତଲ୍ପୟୋର୍ଭୁଜଂଗ ମୌକ୍ତିକସ୍ରଜୋର୍ଗ-
-ଇଷ୍ଠ ରତ୍ନ ଲୋଷ୍ଠୟୋଃ ସୁହୁଦ୍ଦିପକ୍ଷ ପକ୍ଷୟୋ ।
ତୃଣାରବିଂଦ ଚକ୍ଷୁଷୋଃ ପ୍ରଜାମହି ମହେନ୍ଦ୍ରୟୋଃ
ସମପ୍ରବୃତ୍ତିକଃ କଦା ସଦାଶିବଂ ଭଜାମ୍ୟହଂ ॥ ୧୨ ॥

କଦା ନିଲିଂପ ନିର୍ଝରୀ ନିକୁଂଜ କୋଟରେ ବସନ୍
ବିମୁକ୍ତ ଦୁର୍ମତିଃ ସଦା ଶିରଃସ୍ଥମଂଜଲିଂ ବହନ୍ ।
ବିଲୋଲ ଲୋଲ ଲୋଚନୀ ଲଲାମ ଭାଲ ଲଗ୍ନକଃ
ଶିବୋତି ମନ୍ତ୍ର ମୁଚ୍ଚରନ୍ କଦା ସୁଖି ଭବାମ୍ୟହଂ ॥ ୧୩ ॥

ନୀଲୀମ୍ପ ନାଥନାଗରୀ କଦମ୍ବ ମୋଲାମଲ୍ଲିକା
ନିଗୁମ୍ଫନିର୍ଭକ୍ଷରନ୍ମ ଦୁଷ୍ନିକାମନୋହରଃ ।
ତନୋତୁ ନୋ ମନୋମୁଦଂ ବିନୋଦିନି ମହନିଶମ୍
ପରିଶ୍ରୟ ପରଂ ପଦଂ ତଦଂଗଜତବିଷାଂ ଚୟଃ ॥ ୧୪ ॥

ପ୍ରଚଣ୍ଡ ବାଡବାନଲ ପ୍ରଭାସୁଭପ୍ରଚାରଣୀ
ମହାଷ୍ଟସିଦ୍ଧିକାମିନୀ ଜନାବହୁତ ଜଳ୍ପନା ।
ବିମୁକ୍ତ ବାମ ଲୋଚାନୀ ବିବାହକାଲିକାଧ୍ୱନି
ଶିବେତି ମନ୍ତ୍ରଭୂଷଗୋ ଜଗଜ୍ଜୟାୟ୍ୟ ଜାୟତାମ ॥ ୧୫ ॥

ଇମଂ ହି ନିତ୍ୟ ମେବ ମୁକ୍ତ ମୁତ୍ତ ମୋତ୍ତମଂ ସ୍ତବଂ
ପଠନ୍ ସ୍ମରନ୍ ବ୍ରୁବନ୍ନରୋ ବିଶୁଦ୍ଧି ମୋତି ସଂତତଂ ।
ହରେ ଗୁରୋ ସୁଭକ୍ତିମାଶୁ ୟାତି ନାନ୍ୟଥା ଗତିଂ
ବିମୋହନଂ ହି ଦେହିନାଂ ସୁଶଙ୍କରସ୍ୟ ଚିଂତନମ୍ ॥ ୧୬ ॥

ପୂଜାବସାନ ସମୟେ ଦଶବକ୍ତ୍ର ଗୀତଂ
ଯଃ ଶଂଭୁ ଫୁଜନପରଂ ପଠତି ପ୍ରଦୋଷେ ।
ତସ୍ୟ ସ୍ଥିରାଂ ରଥ ଗଜେନ୍ଦ୍ର ତୁରଂଗ ୟୁକ୍ତାଂ
ଲକ୍ଷ୍ମୀ ସଦୈବ ସୁମୁଖିଂ ପ୍ରଦଦାତି ଶମ୍ଭୁଃ ॥ ୧୭ ॥

॥ ଇତି ଶ୍ରୀ ରାବଣ-କୃତମ ଶିବ ତାଣ୍ଡବ ଷ୍ଟୋତ୍ରମ୍ ସମ୍ପୂର୍ଣମ୍॥

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